मध्य प्रदेश के प्रमुख लोकनृत्य
अनेकता में एकता को संजोये हुए भारत उस गुलदस्ते की तरह हैं जिसमें भिन्न-भिन्न रंगों के फूलों एवं पत्तियों को इस तरह रखा जाता है कि उनकी शोभा द्विगुणित हो जाती है। इसी तरह हमारे देश की सीमा के विभिन्न राज्यों एवं क्षेत्रों की अपनी अलग-अलग भाषा एवं संस्कृति के साथ साथ इन क्षेत्रों की अपनी अलग ही लोक गीतों व लोक नृत्यों की समृद्ध विरासत भी हैः जो आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध में कहीं न कहीं लुप्त होती जा रही है। जो मनुष्य संगीत साहित्य कला से विहीन हैं वे साक्षात् पशु के समान है , यद्यपि उनके सींग और पूँछ नहीं होते फिर भी वे पशु समान हैं , विद्वानों का मानना है कि जो जनजातियां नाचती गाती नहीं - उनकी संस्कृति समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम विलुप्त हो रही इन लोक नृत्यों एवं लोक गायनों के धरोहर को संजो कर नहीं रख पाये तो आने वाली पीढ़ी के लिए इसकी जानकारी भी शेष नहीं रह जायेगी। भारत के किसी अन्य हिस्से की तरह मध्यप्रदेश भी देवी-देवताओं के समक्ष किए जानेवाले और विभिन्न अनुष्ठानों से संबंधित लोक नृत्यों द्वारा अपनी संस्कृती का एक परिपूर्ण द...